राजस्थान का साहित्यिक आंदोलन‘ पुस्तक के अंश
साहित्यकारों की खेमेबाजी के बीच गुलेरी को याद किया
Uttarakhand ki Aawaz By GR Jayaswal
देहरादून, राजस्थान मैं साल 2016 तक प्रदेश के प्रमुख शहरों में राजस्थान के साहित्यिक आंदोलन को लेकर पहुंच चुका था। राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में जाने पर मुझे अच्छे अनुभव हुए, अच्छे लोग मिले, अच्छे कलमकार और कलाकार मिले। बस साहित्यकारों के बीच खेमेबाजी और ईगो की लड़ाई मुझे दुखी कर जाती थी। मैंने देखा कि खेमेबाजी और ईगो की लड़ाई से कोई शहर या गांव अछूता नही है। मेरा मानना है कि मतभेद हो, चर्चा-परिचर्चा हो, अपना मत रखा जाए लेकिन मनभेद ना हो और ना ही दूसरे से बड़ा मानने की जिद हो। बड़े तो आप वैसे भी अपनी कलम से प्रमाणित होंगे और पाठक आपको बड़ा बनाएगा।
मैं छोटे-बड़े और समान आयु के कलमकारों से सीखने की ललक और साहित्य और पत्रकारिता के प्रति अपने कर्तव्य को लेकर बढ़े जा रहा था। जयपुर और चित्तौड़गढ़ के साथ ही दिल्ली मेरा कार्यस्थल है इसलिए कभी-कभी राजस्थान साहित्यिक आंदोलन को लेकर राजस्थान मूल के कलमकारों और कलाकारों के बीच दिल्ली पहुंच जाता। सच तो यह है कि मिशनरी भाव और एकजुटता के साथ ऐसे साहित्य की रचना होनी चाहिए, जो व्यक्ति और समाज दोनो को प्रभावित कर सके। मैं यह नही कहता कि ऐसा नही हो रहा है लेकिन छोटे-बड़े मतभेदों को भुलाकर दम से आगे बढ़ने की जरूरत तो है ही।
मेरा कारवां बढ़ता जा रहा था। राजस्थान साहित्यिक आंदोलन में चर्चा-परिचर्चा, व्याख्यान, सेमिनार, कार्यशालाओं के बीच राजस्थान के प्रमुख साहित्यकारों को याद किया जा रहा था । प्रदेश के प्रमुख साहित्यकारों की बात हो और 7 जुलाई 1883 को जयपुर में जन्में हिन्दी के कथाकार, व्यंगकार तथा निबन्धकार चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी‘ को याद नही किया जाए, ऐसा हो नही सकता था। दिल्ली में 30 जनवरी 2017 को गुलेरी के जीवन पर परिचर्चा हुई और शाम को काॅस्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में एक समारोह में तत्कालीन राज्यसभा सांसद श्री आर.के. सिन्हा ने राजस्थान मीडिया एक्शन फोरम की वेबसाइट का शुभारंभ किया।
चंद्रधर को बीस वर्ष की उम्र के पहले ही जयपुर की वेधशाला के जीर्णोद्धार तथा उससे सम्बन्धित शोधकार्य के लिए गठित मण्डल में चुन लिया गया था और कैप्टन गैरेट के साथ मिलकर उन्होंने ‘द जयपुर ऑब्जरवेटरी एण्ड इट्स बिल्डर्स‘ शीर्षक अंग्रेजी ग्रन्थ की रचना की।
अपने अध्ययन काल में ही उन्होंने सन् 1900 में जयपुर में नागरी मंच की स्थापना में योगदान दिया और सन् 1902 से मासिक पत्र ‘समालोचक’ के सम्पादन का भार भी सँभाला। कुछ वर्ष काशी की नागरी प्रचारिणी सभा के सम्पादक मंडल में भी उन्हें सम्मिलित किया गया। उन्होंने देवी प्रसाद ऐतिहासिक पुस्तकमाला और सूर्य कुमारी पुस्तकमाला का सम्पादन किया और नागरी प्रचारिणी पुस्तकमाला और सूर्य कुमारी पुस्तकमाला का सम्पादन किया और नागरी प्रचारिणी सभा के सभापति भी रहे।
सन् 1916 में उन्होंने मेयो कॉलेज में ही संस्कृत विभाग के अध्यक्ष का पद सँभाला। सन् 1920 में उन्होंने बनारस आकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राच्यविद्या विभाग के प्राचार्य और फिर 1922 में प्राचीन इतिहास और धर्म से सम्बद्ध मनीन्द्र चन्द्र नन्दी पीठ के प्रोफेसर का कार्यभार भी ग्रहण किया। 12 सितम्बर 1922 को काशी में पीलिया के बाद तेज ज्वर से मात्र 39 वर्ष की अल्पायु में उनका देहावसान हो गया।
इस थोड़ी-सी आयु में ही गुलेरी जी ने अध्ययन और स्वाध्याय के द्वारा हिन्दी और अंग्रेजी के अतिरिक्त संस्कृत, प्राकृत, बांग्ला, मराठी आदि का ही नहीं जर्मन तथा फ्रेंच भाषाओं का ज्ञान भी हासिल किया था। उनकी रुचि का क्षेत्र भी बहुत विस्तृत था और धर्म, ज्योतिष इतिहास, पुरातत्त्व, दर्शन भाषाविज्ञान शिक्षाशास्त्र और साहित्य से लेकर संगीत, चित्रकला, लोककला, विज्ञान और राजनीति तथा समसामयिक सामाजिक स्थिति तथा रीति-नीति तक फैला हुआ था।
39 वर्ष की जीवन-अवधि में उन्होंने कहानियाँ, लघु-कथाएँ, आख्यान, ललित निबन्ध, गम्भीर विषयों पर विवेचनात्मक निबन्ध, शोधपत्र, समीक्षाएँ, सम्पादकीय टिप्पणियाँ, पत्र विधा में लिखी टिप्पणियाँ, समकालीन साहित्य, समाज, राजनीति, धर्म, विज्ञान, कला आदि पर लेख तथा वक्तव्य, वैदिकध्पौराणिक साहित्य, पुरातत्त्व, भाषा आदि पर प्रबन्ध, लेख तथा टिप्पणियाँ लिखीं। उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कहानी ‘उसने कहा था’ का प्रकाशन सरस्वती में 1915 ई. में हुआ। उन्होंने ‘कछुआ धरम’ और ‘मारेसि मोहि कुठाऊँ’ नामक निबंध और पुरानी हिन्दी नामक लेखमाला भी लिखी। ‘महर्षि च्यवन का रामायण’ उनकी शोधपरक पुस्तक थी।
उनके लेखन की रोचकता उसकी प्रासंगिकता के अतिरिक्त उसकी प्रस्तुति की अनोखी भंगिमा में भी निहित है। उस युग के कई अन्य निबन्धकारों की तरह गुलेरी जी के लेखन में भी मस्ती तथा विनोद भाव एक अन्तर्धारा लगातार प्रवाहित होती रहती है। धर्मसिद्धान्त, अध्यात्म आदि जैसे कुछ एक गम्भीर विषयों को छोड़कर लगभग हर विषय के लेखन में यह विनोद भाव प्रसंगों के चुनाव में भाषा के मुहावरों में उद्धरणों और उक्तियों में बराबर झंकृत रहता है। जहाँ आलोचना कुछ अधिक भेदक होती है, वहाँ यह विनोद व्यंग्य में बदल जाता है-जैसे शिक्षा, सामाजिक, रूढ़ियों तथा राजनीति सम्बन्धी लेखों में इससे गुलेरी जी की रचनाएँ कभी गुदगुदाकर, कभी झकझोरकर पाठक की रुचि को बाँधे रहती हैं।
वरिष्ठ पत्रकार और कवि श्री वीर सक्सेना ने परिचर्चा में चंद्रधर शर्मा की कृतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा था कि उनका सरोकार अपने समय के केवल भाषिक और साहित्यिक आन्दोलनों से ही नहीं, उस युग के जीवन के हर पक्ष से था। किसी भी प्रसंग में जो स्थिति उनके मानस को आकर्षित या उत्तेजित करती थी, उस पर टिप्पणी किए बगैर वे रह नहीं पाते थे। ये टिप्पणियाँ उनके सरोकारों, कुशाग्रता और नजरिये के खुलेपन की गवाही देती हैं। अनेक प्रसंगों में गुलेरी जी अपने समय से इतना आगे थे कि उनकी टिप्पणियाँ आज भी हमें अपने चारों ओर देखने और सोचने को मजबूर करती है
