उत्तराखंड की आवाज़
शीर्षक: क्या सरकारी स्कूलों के बच्चों को केवल मजदूर ही बनाना है?
✍️ लेखक: रविंद्र कुलवंशी, संस्थापक – डॉ. अंबेडकर स्टूडेंट यूनियन (DASU)
—
सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए “लर्निंग बाय डूइंग” नामक कार्यक्रम के अंतर्गत पंचर बनाना, पकोड़े तलना, माली और सफाई कर्मचारी की ट्रेनिंग देना एक चिंताजनक और पक्षपाती नीति का संकेत देता है। ये कार्यक्रम सिर्फ़ कक्षा 6 से 8 तक के सरकारी स्कूलों में लागू किए जा रहे हैं, जहाँ अधिकतर बच्चे गरीब, दलित, पिछड़े वर्ग और मजदूर परिवारों से आते हैं।
—
❗ सवाल यह उठता है:
जब देश के सीबीएसई, आईसीएसई और अन्य महंगे निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए ऐसा कोई कौशल प्रशिक्षण अनिवार्य नहीं है, तो फिर गरीब बच्चों को ही सफाईकर्मी, माली, रसोइया और पंचर बनाने वाला क्यों बनाया जा रहा है? क्या सरकार का यह इरादा है कि ये बच्चे जीवन भर वही “निम्न स्तरीय” सेवाएं करें जो आज उनके माँ-बाप करते आ रहे हैं?
—
🔍 यह दोहरा मापदंड क्यों?
1. यदि यह कौशल प्रशिक्षण “सभी” बच्चों के लिए है तो फिर अमीरों के बच्चों को भी वही प्रशिक्षण क्यों नहीं?
2. क्या सीबीएसई और निजी स्कूलों में भी “पकोड़ा बनाना” और “झाड़ू लगाना” अनिवार्य किया जाएगा?
3. क्या यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) का सीधा उल्लंघन नहीं है?
—
👨🏫 शिक्षा का उद्देश्य
शिक्षा केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि सोचने, समझने और समाज को बदलने की शक्ति देती है। यदि सरकारी स्कूलों में सिर्फ़ मजदूरी से जुड़े कामों की शिक्षा दी जाएगी, तो ये बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, प्रोफेसर, जज या प्रशासक कैसे बनेंगे?
अगर बच्चों को सिखाना ही है तो उन्हें सॉफ्टवेयर डेवलपिंग, टेक्निकल एजुकेशन, ऑटोमोबाइल टेक्नोलॉजी, म्यूजिक, खेल (Sports) और नवाचार जैसी शिक्षा क्यों नहीं दी जा रही?
साथ ही साथ उन्हें भारत में हो रहे सामाजिक और जातिगत अत्याचार, शिक्षा का बाजारीकरण और जातिवाद आधारित व्यवस्था के खिलाफ भी शिक्षित किया जाना चाहिए, ताकि वे देश को बेहतर दिशा में ले जा सकें।
—
🎯 हमारी माँग
डॉ. अंबेडकर स्टूडेंट यूनियन (DASU) की ओर से हम सरकार से यह मांग करते हैं कि:
✅ यह प्रशिक्षण या तो सभी स्कूलों में लागू हो, या फिर इसे पूरी तरह से वैकल्पिक बनाया जाए।
✅ बच्चों को उनके मनपसंद करियर की दिशा में बढ़ने के लिए उचित संसाधन और मार्गदर्शन दिया जाए।
✅ सरकारी स्कूलों में भी वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं, कम्प्यूटर क्लास, रोबोटिक्स लैब और आधुनिक लाइब्रेरी जैसी सुविधाएं दी जाएं।
✅ बच्चों को संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक न्याय पर आधारित शिक्षा दी जाए।
—
🧱 निष्कर्ष
गरीब बच्चे कोई प्रयोगशाला के चूहे नहीं हैं। वे भी सपने देखते हैं, और उनके भी अधिकार हैं। हमें ऐसे किसी भी फैसले का विरोध करना चाहिए जो शिक्षा के नाम पर उनके भविष्य को सीमित कर दे।
“हम सिर्फ़ सफाई नहीं करेंगे, हम संविधान भी पढ़ेंगे, और चलाएंगे भी!”
जय भीम।
✊
रविंद्र कुलवंशी
संस्थापक – डॉ. अंबेडकर स्टूडेंट यूनियन (DASU)
संपर्क करें 9897430572
