उत्तराखंड की आवाज़
दलित पैंथर का उदय महाराष्ट्र में क्यों हुआ?
और
भीम आर्मी का उदय उत्तरप्रदेश में क्यों हुआ?
क्या इतिहास फिर से दोहराया जा रहा है?
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उत्तराखंड की आवाज़ देहरादून,5/7/2025
ता. 6/12/1956 के दिन बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर के निर्माण के बाद उनकी संकल्पना से तैयार की गई रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) का उनके अनुयाईऑ द्वारा गठन करके महाराष्ट्र में और अन्य प्रदेशों में इलेक्शन के जरिए इस देश के दबे कुचले, दलित, शोषित पीड़ितों की आवाज उठाने का काम RPI के जरिए किया गया।
1960 और 1970 के दशक में जहां कांग्रेस की बोलबाला थी और कांग्रेस के नाम से कुत्तियां को खड़ी कर देते तो भी वह चुनाव जीत जाता था इसी परिस्थितियों में भी RPI के सांसद, विधायक, पार्षद और लोकल बॉडी में सदस्य चुनकर आते थे यह RPI की बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
किसी भी राजनीतिक पार्टी को चुनाव जीतने के लिए सिर्फ अपने बेज़िक वोटो से चुनाव जीत नहीं सकती है लेकिन बेज़िक वोटो के साथ-साथ समाज के अन्य वर्गों के बिच भाईचारे का निर्माण करके उनके वोटों को भी हासिल करना अनिवार्य होता है तब जाकर कोई भी पार्टी अपना उम्मीदवार चुनकर ला सकती हैं।
बस इसी ही मेथड पर RPI ने भी सिर्फ दलित वोटों को अपनी तरफ ना खींचते हुए समाज के अन्य जाति और धर्म के लोगों के वोटों का ध्रुवीकरण किया और उसे ध्रुवीकरण के परिणाम स्वरूप अपने सांसद, विधायक, पार्षद एवं लोकल बॉडी में सदस्य चुनकर लाने में सफलता हासिल की
कांग्रेस के मध्याह्न के तपते सूरज की रोशनी पर आरपीआई की यह सफलता एक बहुत बड़ा चैलेंज था और उस चैलेंज को किस तरह से सॉल्व किया जाए यह भी बहुत बड़ा पेचिदा प्रश्न कांग्रेस के लिए था।
राजनीति का एक बहुत बड़ा सिद्धांत है कि या तो अपने विरोधियों को साम, दाम, दंड, भेद के जरिए अपने साथ आने को मजबूर करो, अगर अपने साथ लाने में सफल नहीं हो जाते हो तो अपने विरोधियों का विभाजन कर दो अर्थात विरोधियों की ताकत का विभाजन कर दो।
महाराष्ट्र में कांग्रेस ने बस यही किया। 1972 में दलित पैंथर का उद्भव हुआ। दलित पैंथर के कुछ नौजवान और नव सीखिए लोगों को पर्दे के पीछे दौरी संचार करके मराठावाड़ यूनिवर्सिटी का नामांतरण डॉ बाबासाहेब अंबेडकर यूनिवर्सिटी करने के लिए उकसाया और तैयार किया गया। अलबत्ता बाबा साहब आंबेडकर के प्रति अपनी श्रद्धा और सम्मान के चलते दलित पैंथरने यह मुद्दा उठा लिया। यह मुद्दा उठाया तब तक दलित पैंथर के पदाधिकारी और कार्यकर्ताऑ कतई कांग्रेस ऐसी भनक नहीं लगी कि कांग्रेस पर्दे के पीछे से हमारा उपयोग कर रही है। दलित पैंथर के साथी तो सिर्फ़ डॉ बाबा साहब आंबेडकर के नाम के लिए अपनी श्रद्धा के हिसाब से इस मुद्दे पर कूद पड़े थे, कांग्रेस का षड्यंत्र समझने में नाकाम हमारे भोले भाले स्थितियों फिर एक जबरदस्त आंदोलनको जन्म दिया। यह आंदोलन 10 साल तक लंबा चला। इस आंदोलन में दलित पैंथर नाम के संगठन ने जबरदस्त सक्रिय भूमिका निभाई ये ऐतिहासिक सत्य है।
कल तक महाराष्ट्र में RPI को दलित शोषित वर्ग के वोट के साथ साथ अन्य वर्ग के वोट मिलते थे। इन वोटों का सिलसिला बंद हो गया क्योंकि इस आंदोलन के बाद महाराष्ट्र का पॉलिटिक्स वातावरण दलित विरुद्ध बिन दलित मूवमेंट में बदल गया। और दलित विरुद्ध बिन दलित वातावरण बनने के कारण बिन दलित ( Other than SC) का वोट RPI को मिलना बंद हो गया।
अनुसूचित जाति के लोगों के सिवा अन्य वर्ग के लोगों का वोट पहले RPI को मिलता था, लेकिन इस आंदोलन के बाद यह वोट RPI की तरफ डाइवर्ट करना बहुत ही मुश्किल हो गया था। नतीजा यह हुआ कि RPI को अन्य वर्गों का वोट ना मिलने के कारण फिर कभी RPI का सांसद या विधायक चुनकर आना बंद हो गया। और जब सांसद और विधायक चुनकर आना बंद हो गया तो आरपीआई में काम करने वाले लोगों को भी यह लगने लगा कि अब आरपीआई के जरिए सत्ता के स्थान पर पहुंचना संभव नहीं है। और फिर कांग्रेस और मनुवादी मीडिया द्वारा प्रसारित किया गया यह “होऊं शकत नाही” वाली मान्यता के प्रभाव में आकर आरपीआई का अलग-अलग कई गुटों में विभाजन हो गया।
दलित वर्ग (अनुसूचित जाति) की आवाज़ को संसद और विधानसभा में मजबूती से रखती हुई एक मात्र दलित , शोषितों की पार्टी का समय से पहले कहीं गुटों में विभाजन होकर अस्तित्वहीन बन जाना दलित आंदोलन के लिए बहुत बड़ा कुठाराघात था। और कांग्रेस के लिए बहुत बड़ी कामयाबी थी। कांग्रेस जो चाहती थी कि RPI को तहस-नहस करने का उनका सपना पूरा हो गया। आरपीआई को तहसनगर करने का सपना वाया दलित पैंथर के आंदोलन से खत्म करने के बाद अब कांग्रेस को दलित पैंथर की जरूरत नहीं रही। मराठावाड़ यूनिवर्सिटी के नामांतरण का बहुत बड़ा भयंकर आंदोलन चलाकर कांग्रेस ने पर्दे के पीछे से अपनी भूमिका निभाते हुए अनुसूचित जाति के मजबूत संगठन दलित पैंथर द्वारा दलित विरुद्ध बिन दलित आंदोलन के जरिए दलित और अन्य वर्गों के बीच बड़ी खाई पैदा कर दी। नतीजन RPI के जरिए समाज के अन्य वर्गों के बीच नजदीकियां बढ़ाने का जो अवसर पैदा हुआ था वो हमेशा के लिए खत्म कर दिया।
1970 और 1980 के दशक में महाराष्ट्र में दलित पैंथर का एक अलग ही जलवा था। अन्य वर्ग के लोगों में दलित पैंथर का डर था। दलित पैंथर एक उग्रवादी संगठन के नाम से पहचाना जा रहा था। दलित पैंथर महाराष्ट्र में और महाराष्ट्र के सरहदी राज्यों में जल्दी से फैलता हुआ दलित अस्मिता का एक प्रतीक बन गया था । आज के समय में जो युवा आज भीम आर्मी में शामिल होकर अपने आप को दबंग बताने की स्पर्धा कर रहे हैं बस उसी वक्त पर भी दलित पैंथर में शामिल होकर दलित नवयुवक अपने आप को गौरवविंत महसूस करता था। महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में दलित पैंथर के बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित होते थे और बहुत बड़ा खर्च भी होता था। कांग्रेस की साजिश से अनजान दलित पैंथर के साथियों ने इस बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित करने के लिए पैसा कहां से आता है? इसके बारे में दलित पैंथर के पदाधिकारी और छोटे कार्यकर्ताओं ने कभी प्रश्न नहीं किया या तो कभी खोज करने का प्रयास नहीं किया।
नतीजा यह हुआ कि आरपीआई को खत्म करने के मिशन में सफलता हासिल करने के बाद कांग्रेस को अब दलित पैंथर की कोई जरूरत नहीं थी। इसलिए कांग्रेस ने धीरे-धीरे दलित पैंथर को आर्थिक और अन्य सहयोग जो प्रत्येक के पीछे से दिया करती थी वह धीरे-धीरे बंद कर दिया। और फिर दलित पैंथर को जो आर्थिक सहायता पर्दे के पीछे से मिल रही थी वह बंद होने के कारण धीरे-धीरे दलित पैंथर की मूवमेंट भी बंद होने लगी और आज हम देख रहे हैं कि दलित पैंथर पहले की तरह कोई प्रभावशाली सक्रिय और आक्रामक भूमिका में नहीं है। हां कभी कभी अनुसूचित जाति पर हुए अत्याचार पर अपनी मर्यादित शक्तियों का उपयोग करते हुए अपना विरोध जताकर अपने जिन्दा होने का एहसास दिलाते हैं।
RPI जैसी मजबूत राजनीतिक पार्टी खत्म होने के बाद मान्यवर कांशीराम साहब और बहन मायावती जी के अथक प्रयासों से उत्तर प्रदेश में समाज के दबे कुचले लोगों की एक मात्र राष्ट्रीय पार्टी बहुजन समाज पार्टी अस्तित्व में आई हैं। बहुजन समाज पार्टी के जरिए हम लोगों ने उत्तर प्रदेश में चार-चार बार सत्ता के सिंहासन को कब्जे किया है और सत्ता के माध्यम से आप क्या कर सकते हो यह भी महसूस किया। और बहन कुमारी मायावती जी के कुशल नेतृत्वमें बहुजन समाज पार्टी ने कई उतार चढ़ाव भी देखे लेकिन मनुवादियों के आगे झुकी नहीं। दबे कुचले समाज के स्वाभिमान और आत्म सम्मान आंदोलन को मजबूरी से आगे बढ़ती हुई बहुजन महामानवों के विचारधारा पर आधारित बहुजन समाज पार्टी को भी RPI की तरह खत्म करने के लिए कांग्रेस, बीजेपी और अन्य मनुवादी पार्टियां हमेश सक्रिय है। 1985 में बामसेफ को रजिस्टर्ड करा कर कांग्रेस ने बसपा को खत्म करने का प्रयास किया था लेकिन मान्यवर कांशीराम साहब के कुशल नेतृत्व और दीर्घदृष्टि के कारण बहुजन समाज पार्टी को ज्यादा नुकसान होने से बचा लिया गया।
बाद में भी समय समय पर मान्यवर कांशीराम साहब और बहन मायावती जी पर कांग्रेस और भाजपा के द्वारा शाम, दाम, दंड, भेद की नीतियां अख्तियार करते हुए अपने साथ आने के लिए मजबूर करते थे लेकिन मान्यवर कांशीराम साहब के जीते तो यह पार्टियों सफल नहीं हो पाई।
मान्यवर कांशीराम साहब के निर्माण के बाद भी कांग्रेस और भाजपा ने बहन मायावती जी पर उनके साथ आने का दबाव बनाए रखा। लेकिन बहन मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी को खत्म करना जब इन मनुवादी पार्टियों को असंभव लगने लगा तब उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाया कि बहुजन समाज के लोगों में बंटवारा किया जाए और उनकी ताकत को दो तीन चार हिस्सों में बांट दिया जाए।
महाराष्ट्र में RPI को खत्म करने के लिए पर्दे के पीछे से कांग्रेस द्वारा दलित पैंथर के जरिए दलित विरुद्ध बिन दलित आंदोलन को जिस तर्ज पर हवा दी गई थी बस उसी ही तर्ज पर उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी को खत्म करने के लिए दलित विरुद्ध बिन दलित प्रोपोगंडा के तहत भीम आर्मी को प्रायोजित तरीके से अस्तित्व में लाया गया है।
मराठा वार्ड यूनिवर्सिटी नामांतरण आंदोलन के वक्त पर्दे के पीछे से जो शक्तियां दलित पैंथर को साधन मुहैया कराते थे वो ही शक्तियां आज भीम आर्मी को भी पर्दे के पीछे से तमाम साधन सहायता मुहैया कराती है।
चंद्रशेखर रावण का नगीना संसदीय क्षेत्र से संसद के तौर पर चुनाव जितना यह बहुत बड़ी साजिश है। इसलिए इस गलत फहमी में कभी मत रहना कि चंद्रशेखर रावण की आजाद समाज पार्टी का नगीना में बहुत बड़ा नेटवर्क और लोकप्रियता होने के कारण चंद्रशेखर चुनाव जीत गए हैं। बकरे को हलाल करने से पहले बकरेको चारा पानी देना बहुत जरूरी होता है, अन्यथा बकरा हलाल होने के लिए जल्दी तैयार नहीं होता है। बस इसी ही तर्ज पर बहुजन समाज नाम के बकरे को हलाल करने के लिए नगीना सीट के संसद नाम का चारा पानी आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर को दिया गया है।
1970 और 1980 के दशक में जो जलवा और जो चमक दमक दलित पैंथर की थी और अनुसूचित जाति के युवा वर्ग में दलित पैंथर में जुड़ने का जो क्रेज था वह क्रेज आज 2020 के दशक में हम भीम आर्मी के प्रति देख रहे हैं। जिस तरह से महाराष्ट्र में RPI को खत्म करने के लिए दलित पैंथर का पर्दे के पीछे से इस्तेमाल किया गया था इसी ही तर्ज पर बहुजन समाज पार्टी को खत्म करने के लिए भीम आर्मी का इस्तेमाल किया जा रहा है।
1970/80 का इतिहास फिर से दोहराया जा रहा है। जो लोग इतिहास को पहचान नहीं सकते हैं और इतिहास से सबक नहीं सीखते हैं उन लोगों की आने वाली नस्लों को इतिहास सबक जरूर सिखाता है।
Dt. 2/06/2025
